भगवद्गीता छठा अध्याय ( ध्यानयोग ) अर्थ सहित | Bhagwat Geeta Chapter 6 In Hindi

भगवद्गीता छठा अध्याय ( ध्यानयोग ) अर्थ सहित | Bhagwat Geeta Chapter 6 In Hindi

श्रीभगवानुवाच

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः !

स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः !! १ !!

भावार्थ : भगवान श्री कृष्ण कहते है – जो पुरुष अपने कर्मफल के प्रति अनासक्त है और जो अपने कर्तव्य का पालन करता है , वाही सन्यासी है और असली योगी है ! वह नहीं , जो न तो अग्नि जलाता है और न कर्म करता है !! 1 !!

In English : Lord Shri Krishna says – The man who is unattached to the fruits of his actions and who performs his duty, is a Sanyasi and a real Yogi! not the one who neither lights the fire nor does work .


यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव !

न ह्यसन्न्यस्तसङ्‍कल्पो योगी भवति कश्चन !! २ !!

भावार्थ : हे पांडूपुत्र ! जिसे सन्यास कहते है , उसे ही तुम योग अर्थात परब्रहम के युक्त होना जानो क्योंकि इन्द्रियतृप्ति के लिए इच्छा को त्यागे बिना कोई कभी योगी नहीं हो सकता !! 2 !!

In English : O son of Pandu! That which is called sannyasa, know that to be yoga, that is, union with the Supreme, because one can never be a yogi without renouncing the desire for sense gratification.


आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते !

योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते !! ३ !!

भावार्थ : अष्टांग योग के नवसाधक के लिए कर्म साधन कहलाता है और योगसिद्ध पुरुष के लिए समस्त भोतिक कार्यकलापो का परित्याग ही साधन कहाँ जाता है !! 3 !!

In English : Karma is called a means for a novice of Ashtanga Yoga and for a Yogsiddha man relinquishing all physical activities is called a means.


यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते !

सर्वसङ्‍कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते !! ४ !!

भावार्थ : जब कोई मनुष्य भोतिक इछाओ का त्याग करके न तो इन्द्रियतृप्ति के लिए कार्य करता है और न सकाम कर्मो में प्रवृत होता है तो वह योगारूढ़ कहलाता है !! 4 !!

In English : When a man, giving up material desires, neither works for sense gratification nor engages in fruitive activities, he is called a yogi.


उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ !

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः !! ५ !!

भावार्थ : मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मन की सहायता से अपना उद्धार करे और अपने को निचे न गिरने दे ! यह मन ही जो मनुष्य का मित्र भी है शत्रु भी !! 5 !!

In English : Man should save himself with the help of his mind and not let himself fall down! It is the mind that is man’s friend as well as his enemy.


बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः !

अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्‌ !! ६ !!

भावार्थ : जो मनुष्य मन को जीत लेता है , उसके लिए मन सर्वश्रेष्ठ मित्र है , किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया उसके लिए मन सबसे शत्रु बन जायेगा !! 6 !!

In English : For the person who conquers the mind, the mind is the best friend, but for the one who has not been able to do so, the mind will become the worst enemy.


जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः !

शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः !! ७ !!

भावार्थ : जिस मनुष्य ने अपने मन को जीत लिया है , उसने पहले ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया है , क्योंकि उसने शांति प्राप्त कर ली है ! ऐसे पुरुष के लिए सुख – दुःख , सर्दी – गर्मी एवं मान – अपमान एक से है !! 7 !!

In English : The man who has conquered his mind has already attained God, because he has attained peace! For such a man, happiness-sorrow, cold-heat and honor-disgrace are the same.


ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः !

युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः !! ८ !!

भावार्थ : जो व्यक्ति अपने अर्जित ज्ञान तथा अनुभूति से पूर्णतया संतुष्ट रहता है , वह आत्म – साक्षात्कार को प्राप्त तथा योगी कहलाता है ! ऐसा व्यक्ति अध्यात्म को प्राप्त तथा जितेन्द्रिय कहलाता है ! वह सभी वस्तुओ को – चाहे वे कंकड़ हो , पत्थर हो या कि सोना – सभी को एक समान देखता है !! 8 !!

In English : The person who is completely satisfied with his acquired knowledge and experience, he has attained self-realization and is called a Yogi! Such a person has attained spirituality and is called Jitendriya. He sees all things – whether they are pebbles, stones or gold – as equals.


सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु !

साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते !! ९ !!

भावार्थ : जब मनुष्य निष्कपट हितेषियो , प्रिय मित्रो , तटस्थो , मध्यस्थो , ईर्ष्यालुओ , शत्रुओ तथा मित्रो , पुण्यात्माओ एवं पापियो को समान भाव से देखता है , तो वह और भी उन्नत माना जाता है !! 9 !!

In English : When a man looks at sincere well-wishers, dear friends, neutrals, arbitrators, envious, enemies and friends, virtuous souls and sinners with an equal attitude, then he is considered more advanced.


योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः !

एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः !! १० !!

भावार्थ : जो योगी व्यक्ति होता है , उसको चाहिए कि वह सदैव अपने शरीर , मन तथा आत्मा को परमेश्वर में लगाये , ध्यान करे और बड़ी सावधानी के साथ अपने मन को वश में करे ! जो समस्त अकांक्षाओ तथा संग्रह्भाव की इछाओ से मुक्त होना चाहिए !! 10 !!

In English : One who is a Yogi, should always engage his body, mind and soul in the Supreme, meditate and control his mind with great care! One who should be free from all aspirations and desires of accumulation.


शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः !

नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्‌ !! ११ !!

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः !

उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये !! १२ !!

भावार्थ : योगाभ्यास के लिए योगी मनुष्य एकांत स्थान में जाकर भूमि पर कुशा बिछा दे और फिर उसे मृगछाल से ढके तथा ऊपर से मुलायम वस्त्र बिछा दे ! आसन न तो बहुत ऊँचा हो , न बहुत नीचा ! यह पवित्र स्थान में स्थित हो ! एक योगी को चाहिए की वह इस पर दृढ़तापूर्वक बेठ जाए और मन , इन्द्रियों तथा कर्मो को वश में करते हुए तथा मन को एक बिंदु पर स्थिर करके ह्रदय को शुद्ध करने के लिए योगाभ्यास करे !! 11 – 12 !!

In English : For the practice of yoga, a yogi person should go to a secluded place and spread a cloth on the ground and then cover it with antelope skin and spread a soft cloth over it. The seat should neither be too high nor too low. May it be located in a holy place! A yogi should sit firmly on it and practice yoga to purify the heart by controlling the mind, senses and actions and fixing the mind on one point.


समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः !

सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌ !! १३ !!

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः !

मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः !! १४ !!

भावार्थ : योग का अभ्यास करने वाले मनुष्य को चाहिए कि वह अपने शरीर , गर्दन तथा सिर को सीधा रखे और नाक के अगले सिरे पर दृष्टि लगाये ! इस प्रकार वह अविचलित तथा दमित मन से , भयरहित , विषयीजीवन से पूर्णतया मुक्त होकर अपने ह्रदय में मेरा चिंतन करे और मुझे ही अपना चरमलक्ष्य बनाये !! 13 – 14 !!

In English : A person practicing yoga should keep his body, neck and head straight and look at the tip of the nose. In this way, with an undisturbed and suppressed mind, without fear, being completely free from sensual life, he should think of me in his heart and make me his ultimate goal.


युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः !

शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति !! १५ !!

भावार्थ : इस प्रकार शरीर , मन तथा कर्म में निरंतर संयम का अभ्यास करते हुए संयमित मन वाले योगी को इस भोतिक अस्तित्व की समाप्ति पर भगवधाम की प्राप्ति होती है !! 15 !!

In English : Thus practicing constant restraint in body, mind and action, a yogi with a restrained mind attains the abode of God at the end of this material existence.


नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः !

न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन !! १६ !!

भावार्थ : हे अर्जुन ! जो मनुष्य अधिक खाता है या बहुत कम खाता है , जो अधिक सोता है अथवा जो पर्याप्त नहीं सोता , उसके योगी बनने की कोई सम्भावना नहीं है !! 16 !!

In English : Hey Arjun! A man who eats too much or too little, who sleeps too much or who does not sleep enough, has no chance of becoming a yogi.


युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु !

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा !! १७ !!

भावार्थ : जो मनुष्य खाने , सोने , आमोद – प्रमोद तथा काम करने की आदतों में नियमित रहता है वह योगाभ्यास द्वारा समस्त भोतिक क्लेशो को नष्ट कर सकता है !! 17 !!

In English : One who is regular in the habits of eating, sleeping, enjoying and working, can destroy all material troubles by the practice of yoga.


यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते !

निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा !! १८ !!

भावार्थ : जब कोई योगी योगाभ्यास द्वारा अपने मानसिक कार्यकलापो को वश में कर लेता है और अध्यात्म में स्थित हो जाता है , अर्थात समस्त भोतिक इछाओ से रहित हो जाता है , तब वह योग में सुस्थिर कहाँ जाता है !! 18 !!

In English : When a yogi has brought his mental activities under control by the practice of yoga and is situated in spirituality, that is, devoid of all material desires, then where does he go, established in yoga.


यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता !

योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः !! १९ !!

भावार्थ : जिस प्रकार से , जहाँ वायु का प्रवाह नहीं होता है वहां दीपक हिलता – डुलता नहीं है , उसी तरह जिस योगी का मन वश में होता है , वह आत्मतत्व के ध्यान में सदैव स्थिर रहता है !! 19 !!

In English : Just as a lamp does not waver where there is no wind, similarly a yogi whose mind is under control is always fixed in meditation on the Self.


यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया !

यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति !! २० !!

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्‍बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्‌ !

वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः !! २१ !!

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः !

यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते !! २२ !

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् !! २३ !!

भावार्थ : सिद्धि की अवस्था में जिसे समाधि कहते है , मनुष्य का मन योगाभ्यास के द्वारा भोतिक मानसिक क्रियाओ से पूर्णतया संयमित हो जाता है ! इस सिद्धि की विशेषता यह है कि मनुष्य शुद्ध मन से अपने को देख सकता है और अपने आप में आनंद उठा सकता है ! उस आनंदमयी स्थिति में वह दिव्य इन्द्रियों द्वारा असीम दिव्यसुख में स्थित रहता है ! इस प्रकार स्थापित मनुष्य कभी सत्य से विपथ नहीं होता और इस सुख की प्राप्ति हो जाने पर वह इससे बड़ा कोई दूसरा लाभ नहीं मानता ! ऐसी स्थिति को पाकर मनुष्य बड़ी से बड़ी कठिनाई में भी विचलित नहीं होता ! यह निसंदेह भोतिक संसर्ग से उत्पन्न होने वाले समस्त दुखो से वास्तविक मुक्ति है !! 20-21 -22 -23 !!

In English : In the state of accomplishment, which is called samadhi, the human mind is completely restrained from physical mental activities by the practice of yoga. The specialty of this achievement is that man can see himself with a pure mind and enjoy himself! In that blissful state he is situated in infinite divine bliss through the divine senses. A man established in this way never deviates from the truth and after attaining this happiness, he does not consider any other benefit greater than this! After getting such a situation, a man does not get distracted even in the biggest difficulty. This is undoubtedly the real liberation from all miseries arising from material association.


स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा !

सङ्‍कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः !

मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः !! २४ !!

भावार्थ : मनुष्य को चाहिए कि वह पुरे संकल्प तथा श्रद्धा के साथ योगाभ्यास में लगे और पथ से विचलित न हो ! उसे चाहिए कि मनोधर्म से उत्पन्न समस्त इछाओ को निरपवाद रूप से त्याग दे और इस प्रकार मन के द्वारा सभी और से इन्द्रियों को वश में करे !! 24 !!

In English : Man should engage in the practice of yoga with full determination and devotion and should not deviate from the path! He should invariably give up all desires arising from the mind and thus subdue all other senses through the mind.


शनैः शनैरुपरमेद्‍बुद्धया धृतिगृहीतया !

आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌ !! २५ !!

भावार्थ : धीरे – धीरे , पूर्ण विश्वासपूर्वक बुद्धि के द्वारा समाधि में स्थित होना चाहिए और इस प्रकार मन को आत्मा में ही स्थित करना चाहिए तथा और कुछ नहीं सोचना चाहिए !! 25 !!

In English : Slowly, with full confidence one should be situated in Samadhi by the intellect and thus the mind should be fixed in the Self and think of nothing else.


यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌ !

ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌ !! २६ !!

भावार्थ : मनुष्य को चाहिए कि जब भी कभी उसका मन अपनी चंचलता तथा अस्थिरता के कारण जहाँ कही भी विचरण करता हो , उसे तुरंत अपने वश में कर लेना चाहिए !! 26 !!

In English : A man should immediately control his mind wherever it wanders due to its fickleness and unsteadiness.


प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्‌ !

उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्‌ !! २७ !!

भावार्थ : जिस योगी का मन मुझ में स्थिर रहता है , वह निश्चय ही दिव्यसुख कि सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करता है ! वह रजोगुण से परे हो जाता है , वह परमात्मा के साथ अपनी गुणात्मक एकता को समझता है और इस प्रकार अपने समस्त विगत कर्मो के फल से निवृत हो जाता है !! 27 !!

In English : The Yogi whose mind is fixed in Me, he certainly attains the highest perfection of divine happiness! He transcends the mode of passion, he realizes his qualitative oneness with the Supreme, and thus becomes free from the fruits of all his past actions.


युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः !

सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते !! २८ !!

भावार्थ : सभी प्रकार से आत्मसंयमी योगी निरंतर योगाभ्यास में रहकर समस्त भोतिक कल्मस से मुक्त हो जाता है और भगवान कि दिव्य प्रेमाभक्ति में परमसुख प्राप्त करता है !! 28 !!

In English : A yogi who is self-controlled in all respects is freed from all material calumny by constant practice of yoga and attains supreme happiness in the transcendental loving service of the Lord.


सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि !

ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः !! २९ !!

भावार्थ : वास्तविक योगी समस्त जीवो में मुझको तथा मुझमे समस्त जीवो को देखता है ! निसंदेह स्वरुपसिद्ध व्यक्ति मुझ परमेश्वर को सर्वत्र देखता है !! 29 !!

In English : The real Yogi sees me in all living beings and all living beings in me. Undoubtedly the self-realized person sees me, the Supreme Lord, everywhere.


यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति !

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति !! ३० !!

भावार्थ : जो मनुष्य मुझे सर्वत्र देखता है और सबकुछ मुझ में देखता है उसके लिए न तो मै कभी अदृश्य होता हूँ और न वह मेरे लिए अदृश्य होता है !! 30 !!

In English : The person who sees me everywhere and sees everything in me, I am never invisible to him and he is invisible to me.


सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः !

सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते !! ३१ !!

भावार्थ : जो योगी मुझे तथा परमात्मा को अभिन्न जानते हुए परमात्मा कि भक्तिपूर्वक सेवा करता है , वह हर प्रकार से मुझमे सदैव स्थित रहता है !! 31 !!

In English : The yogi who devotionally serves the Supreme Soul knowing me and the Supreme Soul as one, he always remains in Me in every way.


आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन !

सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः !! ३२ !!

भावार्थ : हे अर्जुन ! वह पूर्णयोगी है , जो अपनी तुलना से समस्त प्राणियों की उनके सुखो तथा दुखो में वास्तविक समानता को दर्शन करता है !! 32 !!

In English : Hey Arjun! He is the perfect yogi, who by his comparison sees the true equality of all beings in their joys and sorrows.


अर्जुन उवाच

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन !

एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्‌ !! ३३ !!

भावार्थ : अर्जुन ने कहाँ – हे मधुसुधन ! आपने जिस योग्पद्द्ती का संक्षेप में वर्णन किया है , वह मेरे लिए अव्यावहारिक तथा असहनीय है , क्योंकि मन चंचल तथा अस्थिर है !! 33 !!

In English : Arjun said – O Madhusudhan! The method of yoga that you have briefly described is impractical and intolerable for me, because the mind is fickle and unstable.


चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्‌ !

तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्‌ !! ३४ !!

भावार्थ : हे कृष्ण ! चूँकि मन अस्थिर , हठीला तथा अत्यंत बलवान है , अतः मुझे इसे वश में करना वायु को वश में करने से भी अधिक कठिन जान पडता है !! 34 !!

In English : Hey Krishna! Since the mind is fickle, obstinate and extremely strong, I find it more difficult to control it than to control the wind.


श्रीभगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌ !

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते !! ३५ !!

भावार्थ : भगवान श्री कृष्ण ने कहाँ – हे महाबाहु कुन्तीपुत्र ! निसंदेह चंचल मन को वश में करना अत्यंत कठिन है , किन्तु उपयुक्त अभ्यास द्वारा तथा विरक्ति द्वारा ऐसा संभव है !! 34 !!

In English : Where did Lord Shri Krishna say – O mighty-armed son of Kunti! Undoubtedly, it is very difficult to control the fickle mind, but it is possible by suitable practice and detachment!!  34 !!


असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः !

वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः !! ३६ !!

भावार्थ : जिसका मन अस्थिर है , उसके लिए आत्म – साक्षात्कार कठिन कार्य होता है , किन्तु जिसका मन संयमित है और जो समुचित उपाय करता है , उसकी सफलता ध्रुव है ! ऐसा मेरा मानना है !! 36 !!

In English : Self-realization is a difficult task for one whose mind is unsteady, but one whose mind is restrained and who takes proper measures, his success is the pole! this is what I think.


अर्जुन उवाच

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः !

अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति !! ३७ !!

भावार्थ : अर्जुन ने कहाँ – हे कृष्ण ! उस असफल योगी की गति क्या है , जो प्रारंभ में श्रद्धापूर्वक आत्म – साक्षात्कार की विधि ग्रहण करता है , किन्तु बाद में भोतिकता के कारण उससे विचलित हो जाता है और योगसिद्धि को प्राप्त नहीं कर पाता है !! 37 !!

In English : Arjun said – O Krishna! What is the fate of the unsuccessful yogi, who in the beginning with devotion takes up the method of self-realization, but later due to materiality becomes distracted from it and is unable to attain yogasiddhi.


कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति !

अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि !! ३८ !!

भावार्थ : हे महाबाहु कृष्ण ! क्या ब्रहम  प्राप्ति के मार्ग से भ्रष्ट ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक तथा भोतिक दोनों ही सफलताओ से वंचित नहीं होता और छिन्नभिन्न बादल की भांति विनष्ट नहीं हो जाता , जिसके फलस्वरूप उसके लिए किसी लोक में कोई स्थान नहीं रहता !! 38 !!

In English : O great-armed Krishna! Does not such a person who is corrupted by the path of Brahman be deprived of both spiritual and material success and does not get destroyed like a parting cloud, as a result of which there is no place for him in any world.


एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः !

त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते !! ३९ !!

भावार्थ : हे कृष्ण ! यही मेरा संदेह है , और मै आपसे इसे पूर्णतया दूर करने की प्रार्थना कर रहा हूँ ! आपके अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा नहीं है , जो इस संदेह को नष्ट कर सके !! 39 !!

In English : Hey Krishna! This is my doubt, and I am requesting you to clear it completely! There is no one except you who can destroy this doubt.


श्री भगवानुवाच

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते !

न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति !! ४० !!

भावार्थ : भगवान ने कहाँ – हे पृथापुत्र ! कल्याण कार्यो में निरत योगी का न तो इस लोक में और न परलोक में ही विनाश होता है ! हे मित्र ! भलाई करने वाला कभी बुराई से पराजित नहीं होता !! 40 !!

In English : God said – O son of Pritha! A Yogi who is engaged in welfare works is never destroyed either in this world or in the hereafter! Hey friend! the good is never defeated by the evil.


प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः !

शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते !! ४१ !!

भावार्थ : असफल योगी पवित्रात्माओ के लोको में अनेकानेक वर्षो तक भोग करने के बाद या तो सदाचारी पुरुषो के परिवार में या कि धनवानों के कुल में जन्म लेता है !! 41 !!

In English : An unsuccessful yogi, after many years of enjoyment in the worlds of the holy souls, takes birth either in a family of virtuous men or in a family of rich people.


अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्‌ !

एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्‌ !! ४२ !!

भावार्थ : अथवा ( यदि दीर्घकाल तक योग करने के बाद असफल रहे तो ) वह ऐसे योगियों के कुल में जन्म लेता है , जो अतिबुद्धिमान है ! निश्चय ही इस संसार में ऐसा जन्म दुर्लभ है !! 42 !!

In English : Or (if unsuccessful after doing yoga for a long time) he is born in the family of such yogis, who are very intelligent! Surely such a birth is rare in this world.


तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्‌ !

यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन !! ४३ !!

भावार्थ : हे कुरुनन्दन ! ऐसा जन्म पाकर वह अपने पूर्वजन्म की दैवी चेतना को पुनः प्राप्त करता है और पूर्ण सफलता प्राप्त करने के उद्देश्य से वह आगे उन्नति करने का प्रयास करता है !! 43 !!

In English : Hey Kurunandan! After taking such a birth, he regains the divine consciousness of his previous birth, and with the aim of achieving complete success, he tries to progress further.


पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः !

जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते !! ४४ !!

भावार्थ : अपने पूर्व जन्म की दैवी चेतना से वह न चाहते हुए भी स्वतः योग के नियमो की और आकर्षित होता है ! ऐसा जिज्ञासु योगी शास्त्रों के अनुष्ठानो से परे स्थित होता है !! 44 !!

In English : Due to the divine consciousness of his previous birth, he automatically gets attracted towards the rules of yoga even against his wish! Such an aspirant yogi is situated beyond the rituals of the scriptures.


प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः !

अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम्‌ !! ४५ !!

भावार्थ : और जब योगी समस्त कल्मष से शुद्ध होकर सच्ची निष्ठां से आगे प्रगति करने का प्रयास करता है , तो अंततोगत्वा अनेकानेक जन्मो के अभ्यास के पश्चात् सिद्धि – लाभ करके वह परम गंतव्य को प्राप्त करता है !! 45 !!

In English : And when the yogi, being purified from all contamination, strives to progress further with true devotion, he ultimately attains the ultimate destination by attaining perfection after many, many births of practice.


तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः !

कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन !! ४६ !!

भावार्थ : योगी पुरुष तपस्वी से , ज्ञानी से तथा सकामकर्मी से बढ़कर होता है ! अतः हे अर्जुन ! तुम सभी प्रकार से योगी बनो !! 46 !!

In English : A yogi man is greater than an ascetic, a wise man and a workman! Therefore O Arjuna! you become a yogi in every way.


योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना !

श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः !! ४७ !!

भावार्थ : और समस्त योगियों में से जो योगी अत्यंत श्रद्धापूर्वक मेरे परायण में है , अपने अंतःकरण में मेरे विषय में सोचता है और मेरी दिव्य प्रेमभक्ति करता है , वह योग में मुझसे परम अन्तरंग रूप में युक्त रहता है और सभी में सर्वोच्च है ! यही मेरा मत है !! 47 !!

In English : And of all the Yogis, the Yogi who is most devoted to Me, who thinks of Me in his heart and performs transcendental loving service to Me, he is most intimately united with Me in Yoga and is the highest of all! that’s my opinion.

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